“एक मंदिर बन रहा था। एक व्यक्ति वहां से गुजरा। उसने पत्थर तोडते एक श्रमिक से पुछा कि तुम क्या कर रहे हो। उस श्रमिक ने उस व्यक्ति की ओर देखा भी नहीं और क्रोध से कहा क्या तुम अंधे हो, तुम्हे दिख नहीं रहा कि मैं पत्थर तोड रहा हूं वह व्यक्ति आगे बढा, उसने दूसरे श्रमिक से पूछा मित्र क्या कर रहे हो उसे श्रमिन ने व्यक्ति की तरफ देखा और कहा में पत्थर तोड रहा हू, ये मैं अपने बच्चों, पत्नी के लिए रोटी कमा रहा हूं वह व्यक्ति तीसरे श्रमिक की ओर बढा, उसके पास पहुंचा, वह पत्थर तोड रहा था और गीत भी गा रहा था। उसने पूछा क्या कर रहे हो तो उसकी ऑखों में चमक आ गई, मुस्करा कर भवन की ओर इशारा करते हुए उसने कहा भगवान का मन्दिर बना रहा हूं। उसने फिर पत्थर तोडना शुरू कर दिया। तीनों श्रमिक एक ही काम कर रहे थे। लेकिन उन तीनों के सोचने का ढंग, पत्थर तोडने के बारे में भिन्न भिन्न हैं। उस तीसरे श्रमिक ने पत्थर तोडने को भी उत्सव बना दिया है”
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