Friday, October 22, 2010
Thursday, October 21, 2010
जय राम जी की
मैं खुद को समझने निकला हूँ कितना समझा है और कितना समझना बाकी है मैं येही समझने की कोशिश कर रहा हूँ , मुझे तन्हाई पसंद है क्यूंकि वो कभी मेरा साथ नहीं छोड़ती है , मेरे मन में हजारों सवाल है मैं उनका जवाब ढूंडने निकला हूँ , मैंने अपनी उँगलियों से अपनी आखें खूब मल के देखी है फिर भी ना जाने क्यूँ मुझे दिखता है मेरा धुंधला सा अस्क !!!
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