Wednesday, January 19, 2011

लाल चौक जाएँगे तिरंगा फहराएंगे

लाल चौक जाएँगे तिरंगा फहराएंगे
कश्मीर के लाल चौक में तिरंगा फहराने छत्तीसगढ़ के भारतीय जनता युवा मोर्चा के देशभक्त कार्यकर्ता 23 जन. को रायपुर रेलवे स्टेशन से रवाना होंगे
कार्यक्रम......रायपुर से 11 .00 बजे शामिल होने वाले जिला 
रायपुर शहर ,रायपुर ग्रामीण ,भिलाई, दुर्ग,कवर्धा ,राजनंदगांव,धमतरी ,महासमुंद ,कांकेर,जगदलपुर ,दंतेवाडा ,कोंडागांव ,नारायणपुर 
बिलासपुर से 2 .00 बजे शामिल होने वाले जिला 
बिलासपुर ,रायगढ़ ,कोरबा ,चांपा जांजगीर ,जशपुर 
अनुपपुर से 4 .30 बजे शामिल होने वाले जिला कोरिया ,सरगुजा

Wednesday, January 12, 2011

पर्वों का पर्व है महाशिवरात्रि पर्व

शिवरात्रि मात्र एक हिन्दू त्योहार नहीं जिस दिन विविध पकवान पकाकर ग्रहण कर लिए जाए। यह न तो मात्र एक पर्व ही है जिस मौके पर किसी शिवलिंग अथवा शिवालय पर जाकर धूप-अगरबत्ती जलाकर इसकी इतिश्री कर दी जाय। न तो यह एक उत्सव ही है जिस दिन भगवान शिव की बारात के उपलक्ष्य में खोखली खुशी का इजहार कर दिया जाय। यह एक अति पावन महान उपहार है जो पारब्रह्म परमेश्वर के तीन रूपों में से एक रूप की पूर्ण उपासना के द्वारा वरदान के रूप में जीव मात्र को प्राप्त है। 

यह पर्व परम पावन उपलब्धि है जो जीव मात्र को प्राप्त होकर उसके परम भाग्यशाली होने का संकेत देता है। यह परम सिद्धिदायक उस महान स्वरूप की उपासना का क्षण है जिसके बारे में संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने त्रिलोकपति मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के मुखारविन्द से कहलवाया है-


इस पर्व का महत्व सभी पुराणों में वर्णित है। इसमें अभिषेक अर्थात् शिवजी पर धारा लगाने से आशुतोष की कृपा सहज मिलती है। इनकी कृपा से कुछ भी असंभव नहीं है। इस दिन त्रिपुण्ड लगाकर, रुद्राक्ष धारण करके, शिवजी को बिल्व पत्र, ऋतु फल एवं पुष्प के साथ रुद्र मंत्र अथवा 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जप करना चाहिए। 






 

Sunday, January 9, 2011

सिरपुर छत्तीसगढ़ का एक दर्शनीय स्थल

सिरपुर महानदी, जो कि छत्तीसगढ़ की अत्यन्त पावन नदी है, के तट पर स्थित एक अत्यन्त दर्शनीय स्थल है। सिरपुर का अतीत सांस्कृतिक समृद्धि एवं वास्तुकला के लालित्य से भरपूर रहा है। प्राचीन काल में सिरपुर को श्रीपुर के नाम से जाना जाता था। श्रीपुर पाण्डुवंशीय शासकों के काल में दक्षिण कोसल की राजधानी रही है। पाण्डुवंशीय शासकों के काल में सिरपुर महत्वपूर्ण राजनैतिक व सांस्कृतिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। महाशिवगुप्त बालार्जुन ने अपने 57 वर्षीय दीर्घ शासनकाल में यहां अनेक मंदिर,बौद्ध विहार,सरोवर तथा उद्यानों का निर्माण करवाया। सातवीं सदी में चीन के विख्यात पर्यटक व विद्वान ह्वेनसांग जब भारत आये थे तो उन्होंने सिरपुर की भी
 यात्रा की थी।

जज्बा और लगन हो तो हर मुश्किल हो जाती है आसान

 अगर कुछ कर गुजरने की चाह, लगन और जज्बा हो तो शारीरिक कमी भी किसी को आगे बढ़ने से नहीं रोक सकता। इसके कई उदाहरण हमारे आस-पास ही देखने को मिल जाएंगे। उन्हीं में से एक हैं दसवीं कक्षा के होनहार छात्र डोमेश्वर राम निषाद, जिनकी उंगलिया हारमोनियम में पड़ते ही सुरों का जादू चलने लगता है। डोमेश्वर केवल हारमोनियम ही नहीं बल्कि तबला भी अच्छा बजा लेते हैं, उनकी गायन शैली और आवाज ऐसी है कि कोई भी झूम उठे। 3993-1
    पढ़ाई मे भी होशियार डोमेश्वर ने बातचीत के दौरान बताया कि उन्हें मिलाकर तीन भाईयों में से दो भाई नेत्रहीन हैं। वर्ष 1999 में रायपुर जिले के ग्राम मठपुरैना स्थित शासकीय अंध मूक-बधिर विद्यालय में प्रवेश लिया था और अब कक्षा दसवीं में अध्ययनरत है। मुलाकात के दौरान उन्होंने भावपूर्ण गजल 'परदा मेरी आंखों से उठा क्यों नहीं देते' और बस्तर अंचल की हल्बी बोली में एक सुमधुर गीत सुनाया। डोमेश्वर ने बताया कि बड़े होकर वे संगीत शिक्षक बनना चाहते हैं और संस्कृत भाषा में पारंगत होना चाहते हैं। गायन के समय तबला वादन में पारंगत ग्यारहवीं कक्षा के नेत्रहीन मास्टर सुन्दर लाल पटेल ने संगत किया।
    पटेल ने बताया कि बड़े होकर वे हिन्दी विषय के शिक्षक बनना चाहते हैं। उनका कहना है, हालांकि प्रदेश सरकार आगे बढ़ने के लिए उन्हें हर तरह की सहायता दे रही है। बारहवीं कक्षा के बाद स्नातक स्तर की पढ़ाई के लिए उन्होंने शासन से गुजारिश की है कि अंध मूक-बधिर छात्र-छात्राओं के लिए प्रदेश में एक विशेष कॉलेज की स्थापना की जाए। दोनों छात्रों ने बताया कि उन्हें दैनिक कार्य करने के लिए किसी की सहायता की जरूरत नहीं पड़ती। उन्होंने बताया कि वे लाठी (केन) की सहायता से कहीं भी आ-जा सकते हैं।
   3993-2 इन बच्चों के अलावा यहां पढ़ने वाले हर बच्चे में कोई न कोई विशेषता देखी जा सकती है। यहां के मूक-बधिर बच्चों द्वारा की गई चित्रकारी को देखकर हर किसी के मुंह से 'वाह' निकले बिना नहीं रहता। जब ये बच्चे अपने मन की कल्पना से चित्रकारी शुरू करते हैं तो देखने वालों को लगता है कि ये क्या आड़ी-तिरछी लकीरें हैं, पर जब चित्रकारी पूरी होती है, तो इन चित्रों में छुपे भाव दर्शक को आश्चर्य चकित कर देते हैं। इन बच्चों को चित्रकारी सिखाने वाले शिक्षक श्री शुभेन्दु चौहान स्वयं मूक बधिर हैं और चित्रकारी में पारंगत है। श्री चौहान ने इशारे से बताया कि यहां अध्ययनरत हर बच्चे में कोई न कोई विशेषता है। उन्होंने बताया कि कक्षा छठवीं का छात्र बप्पा राय और कक्षा आठवीं का विकास साहू बहुत ही अच्छा चित्रकारी करते हैं। 3993-3
    स्कूल के अधीक्षक श्री आर.के. शर्मा ने बताया कि राज्य शासन के समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित इस विद्यालय में अंध, मूक और बधिर, बच्चों के लिए कक्षा पहली से बारहवीं तक कक्षाएं लगती हैं। स्कूल में 206 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं, जिसमें से 93 बालिकाएं है। यहां कम्प्यूटर प्रशिक्षण, संगीत चित्रकारी और सिलाई प्रशिक्षण, ब्रेललिपि प्रिंटर की सुविधा सहित छात्र-छात्राओं के लिए उपयोगी गतिविधियां संचालित की जाती है। छात्रावास में रहने वाले विद्यार्थियों को खाना, कपड़ा, पुस्तक-कापी और चिकित्सा सहित इनकी जरूरी आवश्यकताएं नि:शुल्क प्रदान की जाती है। इसके अलावा इन बच्चों को वाचक भत्ता भी दिया जाता है।  श्री शर्मा ने बताया कि इन  बच्चों के लिए जितनी भी योजनाएं बनाकर शासन को भेजी जाती है, शासन से उसकी स्वीकृति मिल जाती है।

Wednesday, January 5, 2011

ईमानदारी की जीत

चारों ओर सुंदर वन में उदासी छाई हुई थी। वन को अज्ञात बीमारी ने घेर लिया था। वन के लगभग सभी जानवर इस बीमारी के कारण अपने परिवार का कोई न कोई सदस्य गवाँ चुके थे। बीमारी से मुकाबला करने के लिए सुंदर वन के राजा शेर सिंह ने एक बैठक बुलाई।

बैठक का नेतृत्व खुद शेर सिंह ने किया। बैठक में गज्जू हाथी, लंबू जिराफ, अकड़ू सांप, चिंपू बंदर, गिलू गिलहरी, कीनू खरगोश सहित सभी जंगलवासियों ने हिस्सा लिया। जब सभी जानवर इकठ्ठे हो गए, तो शेर सिंह एक ऊँचे पत्थर पर बैठ गया और जंगलवासियों को संबोधित करते हुए कहने लगा, "भाइयो, वन में बीमारी फैलने के कारण हम अपने कई साथियों को गवाँ चुके हैं। इसलिए हमें इस बीमारी से बचने के लिए वन में एक अस्पताल खोलना चाहिए, ताकि जंगल में ही बीमार जानवरों का इलाज किया जा सके।'

इस पर जंगलवासियों ने एतराज जताते हुए पूछा कि अस्पताल के लिए पैसा कहाँ से आएगा और अस्पताल में काम करने के लिए डॉक्टरों की जरूरत भी तो पड़ेगी? इस पर शेर सिंह ने कहा, यह पैसा हम सभी मिलकर इकठ्ठा करेंगे।

यह सुनकर कीनू खरगोश खड़ा हो गया और बोला, "महाराज! मेरे दो मित्र चंपकवन के अस्पताल में डॉक्टर हैं। मैं उन्हें अपने अस्पताल में ले आऊँगा।'

इस फैसले का सभी जंगलवासियों ने समर्थन किया। अगले दिन से ही गज्जू हाथी व लंबू जिराफ ने अस्पताल के लिए पैसा इकठ्ठा करना शुरू कर दिया।

जंगलवासियों की मेहनत रंग लाई और जल्दी ही वन में अस्पताल बन गया। कीनू खरगोश ने अपने दोनों डॉक्टर मित्रों वीनू खरगोश और चीनू खरगोश को अपने अस्पताल में बुला लिया।

राजा शेर सिंह ने तय किया कि अस्पताल का आधा खर्च वे स्वयं वहन करेंगे और आधा जंगलवासियों से इकठ्ठा किया जाएगा।

इस प्रकार वन में अस्पताल चलने लगा। धीरे-धीरे वन में फैली बीमारी पर काबू पा लिया गया। दोनों डॉक्टर अस्पताल में आने वाले मरीजों की पूरी सेवा करते और मरीज़ भी ठीक हो कर डाक्टरों को दुआएँ देते हुए जाते। कुछ समय तक सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा। परंतु कुछ समय के बाद चीनू खरगोश के मन में लालच बढ़ने लगा। उसने वीनू खरगोश को अपने पास बुलाया और कहने लगा यदि वे दोनों मिल कर अस्पताल की दवाइयाँ दूसरे वन में बेचें तथा रात में जाकर दूसरे वन के मरीज़ों को देखें तो अच्छी कमाई कर सकते हें और इस बात का किसी को पता भी नहीं लगेगा।

वीनू खरगोश पूरी तरह से ईमानदार था, इसलिए उसे चीनू का प्रस्ताव पसंद नहीं आया और उसने चीनू को भी ऐसा न करने का सुझाव दिया। लेकिन चीनू कब मानने वाला था। उसके ऊपर तो लालच का भूत सवार था। उसने वीनू के सामने तो ईमानदारी से काम करने का नाटक किया। परंतु चोरी-छिपे बेइमानी पर उतर आया। वह जंगलवासियों की मेहनत से खरीदी गई दवाइयों को दूसरे जंगल में ले जाकर बेचने लगा तथा शाम को वहाँ के मरीजों का इलाज करके कमाई करने लगा।

धीरे-धीरे उसका लालच बढ़ता गया। अब वह अस्पताल के कम, दूसरे वन के मरीजों को ज्यादा देखता। इसके विपरीत, डॉक्टर वीनू अधिक ईमानदारी से काम करता। मरीज भी चीनू की अपेक्षा डॉक्टर वीनू के पास जाना अधिक पसंद करते। एक दिन सभी जानवर मिलकर राजा शेर सिंह के पास चीनू की शिकायत लेकर पहुँचे। उन्होंने चीनू खरगोश की कारगुजारियों से राजा को अवगत कराया और उसे दंड देने की माँग की। शेर सिंह ने उनकी बात ध्यान से सुनी और कहा कि सच्चाई अपनी आँखों से देखे बिना वे कोई निर्णय नहीं लेंगे। इसलिए वे पहले चीनू डॉक्टर की जांच कराएँगे, फिर अपना निर्णय देंगे। जांच का काम चालाक लोमड़ी को सौंपा गया, क्योंकि चीनू खरगोश लोमड़ी को नहीं जानता था।

लोमड़ी अगले ही दिन से चीनू के ऊपर नजर रखने लगी। कुछ दिन उस पर नज़र रखने के बाद लोमड़ी ने उसे रंगे हाथों पकड़ने की योजना बनाई। उसने इस योजना की सूचना शेर सिंह को भी दी, ताकि वे समय पर पहुँच कर सच्चाई अपनी आँखों से देख सकें। लोमड़ी डॉक्टर चीनू के कमरे में गई और कहा कि वह पास के जंगल से आई है। वहाँ के राजा काफी बीमार हैं, यदि वे तुम्हारी दवाई से ठीक हो गए, तो तुम्हें मालामाल कर देंगे। यह सुनकर चीनू को लालच आ गया। उसने अपना सारा सामान समेटा और लोमड़ी के साथ दूसरे वन के राजा को देखने के लिए चल पड़ा। शेर सिंह जो पास ही छिपकर सारी बातें सुन रहा था, दौड़कर दूसरे जंगल में घुस गया और निर्धारित स्थान पर जाकर लेट गया।

थोड़ी देर बाद लोमड़ी डॉक्टर चीनू को लेकर वहाँ पहुँची, जहाँ शेर सिंह मुँह ढँककर सो रहा था। जैसे ही चीनू ने राजा के मुँह से हाथ हटाया, वह शेर सिंह को वहाँ पाकर सकपका गया और डर से काँपने लगा। उसके हाथ से सारा सामान छूट गया, क्योंकि उसकी बेइमानी का सारा भेद खुल चुका था। तब तक सभी जानवर वहाँ आ गए थे। चीनू खरगोश हाथ जोड़कर अपनी कारगुजारियों की माफी माँगने लगा।

राजा शेर सिंह ने आदेश दिया कि चीनू की बेइमानी से कमाई हुई सारी संपत्ति अस्पताल में मिला ली जाए और उसे धक्के मारकर जंगल से बाहर निकाल दिया जाए। शेर सिंह के आदेशानुसार चीनू खरगोश को धक्के मारकर जंगल से बाहर निकाल दिया गया। इस कार्रवाई को देखकर जंगलवासियों ने जान लिया कि ईमानदारी की हमेशा जीत होती है।

अपना अपना स्वभाव

एक बार एक भला आदमी नदी किनारे बैठा था। तभी उसने देखा एक बिच्छू पानी में गिर गया है। भले आदमी ने जल्दी से बिच्छू को हाथ में उठा लिया। बिच्छू ने उस भले आदमी को डंक मार दिया। बेचारे भले आदमी का हाथ काँपा और बिच्छू पानी में गिर गया।
भले आदमी ने बिच्छू को डूबने से बचाने के लिए दुबारा उठा लिया। बिच्छू ने दुबारा उस भले आदमी को डंक मार दिया। भले आदमी का हाथ दुबारा काँपा और बिच्छू पानी में गिर गया।
भले आदमी ने बिच्छू को डूबने से बचाने के लिए एक बार फिर उठा लिया। वहाँ एक लड़का उस आदमी का बार-बार बिच्छू को पानी से निकालना और बार-बार बिच्छू का डंक मारना देख रहा था। उसने आदमी से कहा, "आपको यह बिच्छू बार-बार डंक मार रहा है फिर भी आप उसे डूबने से क्यों बचाना चाहते हैं?"
भले आदमी ने कहा, "बात यह है बेटा कि बिच्छू का स्वभाव है डंक मारना और मेरा स्वभाव है बचाना। जब बिच्छू एक कीड़ा होते हुए भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ता तो मैं मनुष्य होकर अपना स्वभाव क्यों छोड़ूँ?"
मनुष्य को कभी भी अपना अच्छा स्वभाव नहीं भूलना चाहिए।

Dosati

शहर से दूर जंगल में एक पेड़ पर गोरैया का जोड़ा रहता था। उनके नाम थे, चीकू और चिनमिन। दोनो बहुत खुश रहते थे। सुबह सवेरे दोनो दाना चुगने के लिये निकल जाते। शाम होने पर अपने घोंसले मे लौट जाते। कुछ समय बाद चिनमिन ने अंडे दिये।

चीकू और चिनमिन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दानों ही बड़ी बेसब्री से अपने बच्चों के अंडों से बाहर निकलने का इंतजार करने लगे। अब चिनमिन अंडों को सेती थी और चीकू अकेला ही दाना चुनने के लिये जाता था। 

एक दिन एक हाथी धूप से बचने के लिये पेड़ के नीचे आ बैठा। मदमस्त हो कर वह अपनी सूँड़ से उस पेड़ को हिलाने लगा। हिलाने से पेड़ की वह डाली टूट गयी, जिस पर चीकू और चिनमिन का घोंसला था। इस तरह घोंसले में रखे अंडे टूट गये। 

अपने टूटे अंडों को देख कर चिनमिन जोरों से रोने लगी। उसके रोने की आवाज सुन कर, चीकू और चिनमिन का दोस्त भोलू -- उसके पास आये और रोने का कारण पूछने लगे। 

चिनमिन से सारी बात सुनकर उन्हें बहुत दुख हुआ। फिर दोनो को धीरज बँधाते हुए भोलू -- बोला, "अब रोने से क्या फायदा, जो होना था सो हो चुका।" 

चीकू बोला, "भोलू भाई, बात तो तुम ठीक कर रहे हो, परंतु इस दुष्ट हाथी ने घमंड में आ कर हमारे बच्चों की जान ले ली है। इसको तो इसका दंड मिलना ही चाहिये। यदि तुम हमारे सच्चे दोस्त हो तो उसको मारने में हमारी मदद करो।" 

यह सुनकर थोड़ी देर के लिये तो भोलू दुविधा में पड़ गया कि कहाँ हम छोटे छोटे पक्षी और कहाँ वह विशालकाय जानवर। परंतु फिर बोला, "चीकू दोस्त, तुम सच कह रहे हो। इस हाथी को सबक सिखाना ही होगा। अब तुम मेरी अक्ल का कमाल देखो। मैं अपनी दोस्त वीना मक्खी को बुला कर लाता हूँ। इस काम में वह हमारी मदद करेगी।" और इतना कह कर वह चला गया। 

भोलू ने अपनी दोस्त वीना के पास पहुँच कर उसे सारी बात बता दी। फिर उसने उससे हाथी को मारने का उपाय पूछा। वीना बोली, "इससे पहले की हम कोई फैसला करे, अपने मित्र मेघनाद मेंढ़क की भी सलाह ले लूँ तो अच्छा रहेगा। वह बहुत अक्लमंद है। हाथी को मारने के लिये जरूर कोई आसान तरीका बता देगा। 

चीकू, भोलू और वीना, तीनों मेघनाद मेंढ़क के पास गये। सारी बात सुन कर मेघनाद बोला, "मेरे दिमाग में उसे मारने की एक बहुत ही आसान तरकीब आयी है। 

वीना बहन सबसे पहले दोपहर के समय तुम हाथी के पास जा कर मधूर स्वर में एक कान में गुंजन करना। उसे सुन कर वह आनंद से अपनी आँखे बंद कर लेगा। उसी समय भोलू अपनी तीखी चोंच से उसकी दोनो आँखें फोड़ देगा। इस प्रकार अंधा हो कर वह इधर-उधर भटकेगा। 

थोड़ी देर बाद उसको प्यास लगेगी तब मैं खाई के पास जा कर अपने परिवार सहित जोर-जोर से टर्-टर् की आवाज करने लगूँगा। हाथी समझेगा की यह आवाज तालाब से आ रही है। वह आवाज की तरफ बढ़ते बढ़ते खाई के पास आयेगा और उसमें जा गिरेगा और खाई में पड़ा पड़ा ही मर जाएगा। 

सबको मेघनाद की सलाह बहुत पसंद आयी। जैसा उसने कहा था, वीना और भोलू ने वैसा ही किया। इस तरह छोटे छोटे जीवों ने मिल कर अपनी अक्ल से हाथी जैसे बड़े जीव को मार गिराया और फिर से प्यार से रहने लगे। शहर से दूर जंगल में एक पेड़ पर गोरैया का जोड़ा रहता था। उनके नाम थे, चीकू और चिनमिन। दोनो बहुत खुश रहते थे। सुबह सवेरे दोनो दाना चुगने के लिये निकल जाते। शाम होने पर अपने घोंसले मे लौट जाते। कुछ समय बाद चिनमिन ने अंडे दिये।

चीकू और चिनमिन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दानों ही बड़ी बेसब्री से अपने बच्चों के अंडों से बाहर निकलने का इंतजार करने लगे। अब चिनमिन अंडों को सेती थी और चीकू अकेला ही दाना चुनने के लिये जाता था। 

एक दिन एक हाथी धूप से बचने के लिये पेड़ के नीचे आ बैठा। मदमस्त हो कर वह अपनी सूँड़ से उस पेड़ को हिलाने लगा। हिलाने से पेड़ की वह डाली टूट गयी, जिस पर चीकू और चिनमिन का घोंसला था। इस तरह घोंसले में रखे अंडे टूट गये। 

अपने टूटे अंडों को देख कर चिनमिन जोरों से रोने लगी। उसके रोने की आवाज सुन कर, चीकू और चिनमिन का दोस्त भोलू -- उसके पास आये और रोने का कारण पूछने लगे। 

चिनमिन से सारी बात सुनकर उन्हें बहुत दुख हुआ। फिर दोनो को धीरज बँधाते हुए भोलू -- बोला, "अब रोने से क्या फायदा, जो होना था सो हो चुका।" 

चीकू बोला, "भोलू भाई, बात तो तुम ठीक कर रहे हो, परंतु इस दुष्ट हाथी ने घमंड में आ कर हमारे बच्चों की जान ले ली है। इसको तो इसका दंड मिलना ही चाहिये। यदि तुम हमारे सच्चे दोस्त हो तो उसको मारने में हमारी मदद करो।" 

यह सुनकर थोड़ी देर के लिये तो भोलू दुविधा में पड़ गया कि कहाँ हम छोटे छोटे पक्षी और कहाँ वह विशालकाय जानवर। परंतु फिर बोला, "चीकू दोस्त, तुम सच कह रहे हो। इस हाथी को सबक सिखाना ही होगा। अब तुम मेरी अक्ल का कमाल देखो। मैं अपनी दोस्त वीना मक्खी को बुला कर लाता हूँ। इस काम में वह हमारी मदद करेगी।" और इतना कह कर वह चला गया। 

भोलू ने अपनी दोस्त वीना के पास पहुँच कर उसे सारी बात बता दी। फिर उसने उससे हाथी को मारने का उपाय पूछा। वीना बोली, "इससे पहले की हम कोई फैसला करे, अपने मित्र मेघनाद मेंढ़क की भी सलाह ले लूँ तो अच्छा रहेगा। वह बहुत अक्लमंद है। हाथी को मारने के लिये जरूर कोई आसान तरीका बता देगा। 

चीकू, भोलू और वीना, तीनों मेघनाद मेंढ़क के पास गये। सारी बात सुन कर मेघनाद बोला, "मेरे दिमाग में उसे मारने की एक बहुत ही आसान तरकीब आयी है। 

वीना बहन सबसे पहले दोपहर के समय तुम हाथी के पास जा कर मधूर स्वर में एक कान में गुंजन करना। उसे सुन कर वह आनंद से अपनी आँखे बंद कर लेगा। उसी समय भोलू अपनी तीखी चोंच से उसकी दोनो आँखें फोड़ देगा। इस प्रकार अंधा हो कर वह इधर-उधर भटकेगा। 

थोड़ी देर बाद उसको प्यास लगेगी तब मैं खाई के पास जा कर अपने परिवार सहित जोर-जोर से टर्-टर् की आवाज करने लगूँगा। हाथी समझेगा की यह आवाज तालाब से आ रही है। वह आवाज की तरफ बढ़ते बढ़ते खाई के पास आयेगा और उसमें जा गिरेगा और खाई में पड़ा पड़ा ही मर जाएगा। 

सबको मेघनाद की सलाह बहुत पसंद आयी। जैसा उसने कहा था, वीना और भोलू ने वैसा ही किया। इस तरह छोटे छोटे जीवों ने मिल कर अपनी अक्ल से हाथी जैसे बड़े जीव को मार गिराया और फिर से प्यार से रहने लगे। 

Tuesday, January 4, 2011

काम के प्रति भावना




एक मंदिर बन रहा था। एक व्‍यक्ति वहां से गुजरा। उसने पत्‍थर तोडते एक श्रमिक से पुछा कि तुम क्‍या कर रहे हो। उस श्रमिक ने उस व्‍यक्ति की ओर देखा भी नहीं और क्रोध से कहा क्‍या तुम अंधे हो, तुम्‍हे दिख नहीं रहा कि मैं पत्‍थर तोड रहा हूं वह व्‍यक्ति आगे बढा, उसने दूसरे श्रमिक से पूछा मित्र क्‍या कर रहे हो उसे श्रमिन ने व्‍यक्ति की तरफ देखा और कहा में पत्‍थर तोड रहा हू, ये मैं अपने बच्‍चों, पत्‍नी के लिए रोटी कमा रहा हूं वह व्‍यक्ति तीसरे श्रमिक की ओर बढा, उसके पास पहुंचा, वह पत्‍थर तोड रहा था और गीत भी गा रहा था। उसने पूछा क्‍या कर रहे हो तो उसकी ऑखों में चमक आ गई, मुस्‍करा कर भवन की ओर इशारा करते हुए उसने कहा भगवान का मन्दिर बना रहा हूं। उसने फिर पत्‍थर तोडना शुरू कर दिया। तीनों श्रमिक एक ही काम कर रहे थे। लेकिन उन तीनों के सोचने का ढंग, पत्‍थर तोडने के बारे में भिन्‍न भिन्‍न हैं। उस तीसरे श्रमिक ने पत्‍‍थर तोडने को भी उत्‍सव बना दिया है